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mahabharat 12.9.32: इस प्रकार यह जीवों का समूह इस संसारचक्र में रथ के पहिये के समान घूमता हुआ अपने-अपने कर्तव्यानुसार अन्य जीवों से मिलता है ॥ 32॥   |   mahabharat अध्याय 12.9: युधिष्ठिरका वानप्रस्थ एवं संन्यासीके अनुसार जीवन व्यतीत करनेका निश्चय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 9: युधिष्ठिरका वानप्रस्थ एवं संन्यासीके अनुसार जीवन व्यतीत करनेका निश्चय  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  12.9.32 
एवं संसारचक्रेऽस्मिन् व्याविद्धे रथचक्रवत्।
समेति भूतग्रामोऽयं भूतग्रामेण कार्यवान्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार यह जीवों का समूह इस संसारचक्र में रथ के पहिये के समान घूमता हुआ अपने-अपने कर्तव्यानुसार अन्य जीवों से मिलता है ॥ 32॥
 
Thus, this group of living beings, moving like the wheel of a chariot in this world cycle, meets other living beings as per their duties. ॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)