श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 87: राष्ट्रकी रक्षा तथा वृद्धिके उपाय  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.87.2 
भीष्म उवाच
राष्ट्रगुप्तिं च ते सम्यग् राष्ट्रस्यैव तु संग्रहम्।
हन्त सर्वं प्रवक्ष्यामि तत्त्वमेकमना: शृणु॥ २॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी बोले- राजन्! अब मैं बड़ी प्रसन्नता के साथ तुम्हें राष्ट्र की रक्षा और वृद्धि का सम्पूर्ण रहस्य बताता हूँ। तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो।
 
Bhishmaji said- King! Now I am telling you with great pleasure the whole secret of protecting and increasing the nation. Listen with full concentration.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)