श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 87: राष्ट्रकी रक्षा तथा वृद्धिके उपाय  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.87.1 
युधिष्ठिर उवाच
राष्ट्रगुप्तिं च मे राजन् राष्ट्रस्यैव तु संग्रहम्।
सम्यग्जिज्ञासमानाय प्रब्रूहि भरतर्षभ॥ १॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा - हे भरतश्रेष्ठ राजा! अब मैं यह भली-भाँति जानना चाहता हूँ कि राष्ट्र की रक्षा और विस्तार किस प्रकार किया जा सकता है, अतः आप कृपा करके इस विषय का वर्णन कीजिए।॥1॥
 
Yudhishthira asked - O best king of Bharata! Now I want to know very well how the nation can be protected and expanded, so please describe this topic.॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)