युधिष्ठिर उवाच
राष्ट्रगुप्तिं च मे राजन् राष्ट्रस्यैव तु संग्रहम्।
सम्यग्जिज्ञासमानाय प्रब्रूहि भरतर्षभ॥ १॥
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा - हे भरतश्रेष्ठ राजा! अब मैं यह भली-भाँति जानना चाहता हूँ कि राष्ट्र की रक्षा और विस्तार किस प्रकार किया जा सकता है, अतः आप कृपा करके इस विषय का वर्णन कीजिए।॥1॥
Yudhishthira asked - O best king of Bharata! Now I want to know very well how the nation can be protected and expanded, so please describe this topic.॥ 1॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥