अध्याय 86: राजाके निवासयोग्य नगर एवं दुर्गका वर्णन, उसके लिये प्रजापालनसम्बन्धी व्यवहार तथा तपस्वीजनोंके समादरका निर्देश
श्लोक 1: युधिष्ठिर ने पूछा, "पितामह! राजा को स्वयं किस प्रकार के नगर में रहना चाहिए? क्या उसे पहले से बनी हुई राजधानी में रहना चाहिए या उसे एक नया नगर बनाकर उसमें रहना चाहिए, यह मुझे बताइए?"
श्लोक 2: भीष्मजी बोले - हे भारत! कुन्तीनन्दन! जिस नगर में राजा अपने पुत्र, बन्धु-बान्धवों और बन्धुओं के साथ निवास करते हैं, वहाँ की जीविका और सुरक्षा की व्यवस्था के विषय में तुम्हारा पूछना उचित है। 2॥
श्लोक 3: अतः मैं तुम्हें किला बनाने की विधि विशेष रूप से बताता हूँ। तुम भी इस बात को सुनकर वैसा ही करो और किला बनाने का प्रयत्न करो।
श्लोक 4: जहाँ सभी प्रकार की सम्पत्तियाँ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हों तथा स्थान बहुत विस्तृत हो, वहाँ राजा को छः प्रकार के दुर्गों का आश्रय लेकर नये नगर बसाने चाहिए।
श्लोक 5: उन छह दुर्गों के नाम इस प्रकार हैं - धन्वदुर्ग 1, महीदुर्ग 2, गिरिदुर्ग 3, मनीषदुर्ग 4, जलदुर्ग 5 और वनदुर्ग 6 । 5॥
श्लोक 6-10: जिस नगर में इनमें से कोई न कोई किला हो, जहाँ अन्न और अस्त्र-शस्त्र प्रचुर मात्रा में हों, जिसकी सुदृढ़ चारदीवारी और गहरी तथा चौड़ी खाई हो, जहाँ हाथी, घोड़े और रथों की प्रचुरता हो, जहाँ विद्वान और शिल्पी रहते हों, जहाँ आवश्यक वस्तुओं से भरे हुए अनेक भण्डार हों, जहाँ धार्मिक और कुशल लोग रहते हों, जो बलवान पुरुषों, हाथियों और घोड़ों से समृद्ध हो, जहाँ के चौराहे और बाजार उसकी शोभा बढ़ा रहे हों, जहाँ की न्याय-व्यवस्था और न्यायालय सुप्रसिद्ध हों, जो सब प्रकार से शान्त हो, जहाँ कहीं से भी भय या उपद्रव न हो, जहाँ प्रकाश की उत्तम व्यवस्था हो, जहाँ संगीत और वाद्यों की ध्वनि गूंजती हो, जहाँ प्रत्येक घर सुंदर और सुव्यवस्थित हो, जहाँ महान योद्धा और धनवान लोग रहते हों, जहाँ वैदिक मन्त्रों की ध्वनि गूँजती रहती हो और जहाँ सामाजिक उत्सवों और देवताओं के पूजन का क्रम सदैव चलता रहता हो, ऐसे नगर में राजा को स्वयं अपने अधीन मंत्रियों और सेना सहित निवास करना चाहिए।
श्लोक 11: राजा को चाहिए कि वह उस नगर में कोष, सेना, मित्रों की संख्या और आचरण को बढ़ाए तथा नगर और बाहर के गांवों में सब प्रकार के दोषों को दूर करे ॥11॥
श्लोक 12: अन्न भंडार और शस्त्र संग्रहालयों को बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिए, सभी प्रकार की वस्तुओं के संग्रहालयों को भी बढ़ाना चाहिए, तथा मशीनों और शस्त्रों के कारखानों का विकास करना चाहिए । 12॥
श्लोक 13-14: वह लकड़ी, लोहा, चावल की भूसी, कोयला, बाँस, काष्ठ, सींग, हड्डी, मज्जा, तेल, घी, चर्बी, मधु, औषधियों का समूह, सन, राल, अन्न, अस्त्र-शस्त्र, बाण, चमड़ा, ताँबा, बेंत तथा जूट और बुलबुल की रस्सी आदि पदार्थों का संग्रह रखता था ॥13-14॥
श्लोक 15: जलाशय (तालाब, झील आदि), कुएँ, प्रचुर जल से भरे हुए बड़े-बड़े तालाब और दूध देने वाले वृक्ष - राजा को इन सबकी सदैव रक्षा करनी चाहिए ॥15॥
श्लोक 16: आचार्य, ऋत्विज, पुरोहित, महान धनुर्धर, गृह निर्माता, ज्योतिषी और वैद्यों का आदर करो॥16॥
श्लोक 17: विद्वान्, बुद्धिमान्, बुद्धिमान्, कार्यकुशल, शूरवीर, ज्ञानी, कुलीन तथा साहस और धैर्य से युक्त पुरुषों को उनकी योग्यता के अनुसार सब कार्यों में लगाओ ॥17॥
श्लोक 18: राजा को चाहिए कि वह धार्मिक लोगों का आदर करे और पापियों को दण्ड दे। उसे चाहिए कि वह सभी वर्णों को उनके अपने-अपने कार्यों में तत्परतापूर्वक लगाए। 18॥
श्लोक 19: गुप्तचरों द्वारा नगर तथा छोटे-छोटे गांवों के आंतरिक तथा बाह्य समाचार ज्ञात करके उसके अनुसार कार्य करना चाहिए।
श्लोक 20: राजा को स्वयं गुप्तचरों से मिलना चाहिए, गुप्त परामर्श लेना चाहिए, कोष का निरीक्षण करना चाहिए और विशेष रूप से अपराधियों को दण्ड देना चाहिए; क्योंकि सारा राज्य इन्हीं पर निर्भर है ॥20॥
श्लोक 21: राजा को गुप्तचरों द्वारा सदैव यह जानकारी रखनी चाहिए कि नगरों और छोटे-छोटे गांवों में उसके शत्रु, मित्र और तटस्थ लोग क्या करना चाहते हैं ॥21॥
श्लोक 22: उनके इरादे जानकर उनके प्रतिशोध का सारा काम बड़ी सावधानी से करना चाहिए। राजा के लिए उचित है कि वह सदैव अपने भक्तों का सम्मान करे और द्वेष रखने वालों को कारागार में डाल दे।
श्लोक 23: उसे प्रतिदिन नाना प्रकार के यज्ञ करने चाहिए और दूसरों को कष्ट न पहुँचाते हुए दान देना चाहिए। प्रजा की रक्षा करनी चाहिए और ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिससे धर्म में बाधा हो।॥23॥
श्लोक 24: गरीब, अनाथ, वृद्ध और विधवा स्त्रियों के कल्याण और जीविका की सदैव व्यवस्था करो ॥24॥
श्लोक 25: राजा को चाहिए कि वह सदैव आश्रमों में समय पर वस्त्र, बर्तन और भोजन आदि भेजे तथा आतिथ्य, पूजा और आदर के साथ सबको ये वस्तुएं प्रदान करे।
श्लोक 26: उसे अपने राज्य के तपस्वियों को अपने स्वास्थ्य, अपनी गतिविधियों और अपने राष्ट्र के बारे में बताने का हर संभव प्रयास करना चाहिए और उनके सामने हमेशा विनम्र रहना चाहिए ॥26॥
श्लोक 27: राजा को चाहिए कि वह ऐसे विद्वान् तपस्वी को देखे जो कुलीन और पाण्डित्य से युक्त हो तथा जिसने समस्त स्वार्थों का त्याग कर दिया हो, उसे शयन, आसन और भोजन देकर उसका आदर करे।
श्लोक 28: चाहे परिस्थिति कितनी भी कठिन क्यों न हो, राजा को तपस्वी पर विश्वास अवश्य रखना चाहिए, क्योंकि चोर और डाकू भी तपस्वी संतों पर विश्वास रखते हैं।
श्लोक 29: राजा को चाहिए कि वह अपना धन तपस्वी के पास रखे और उससे परामर्श ले; परंतु उसके पास बार-बार न जाए, न उसकी संगति करे और न ही उसे अधिक सम्मान दे (अर्थात् गुप्त रूप से उसकी सेवा और आदर करे। यह बात लोगों को ज्ञात न होने दे)।॥29॥
श्लोक 30: राजा को अपने राज्य में, दूसरों के राज्य में, वन में तथा अपने अधीन राजाओं के नगरों में भिन्न-भिन्न तपस्वियों को अपना मित्र बनाकर रखना चाहिए ॥30॥
श्लोक 31: उन सबको आदरपूर्वक आवश्यक वस्तुएँ प्रदान करो। जैसे तुम्हें अपने राज्य के तपस्वियों का आदर करना चाहिए, वैसे ही तुम्हें अन्य राज्यों और वनों में रहने वाले तपस्वियों का भी आदर करना चाहिए॥31॥
श्लोक 32: वे उत्तम व्रतों का पालन करने वाले तपस्वी किसी भी स्थिति में शरणागत राजा को उसकी इच्छानुसार आश्रय दे सकते हैं ॥32॥
श्लोक 33: युधिष्ठिर! आपके प्रश्न के अनुसार मैंने यहाँ उस नगर के लक्षण संक्षेप में बताये हैं, जिसमें राजा को स्वयं निवास करना चाहिए ॥ 33॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥