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mahabharat 12.83.9-10h: जिन्हें तुम अपना प्रिय समझते हो, उन्हें धन, सम्मान, भेंट, आतिथ्य और नाना प्रकार के सुखों से संतुष्ट करो, जिससे तुम्हारे प्रियजन तुम्हारे धन और सुख के भागी बन जाएँ ॥91/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.83: सभासद् आदिके लक्षण, गुप्त सलाह सुननेके अधिकारी और अनधिकारी तथा गुप्त-मन्त्रणाकी विधि एवं स्थानका निर्देश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 83: सभासद् आदिके लक्षण, गुप्त सलाह सुननेके अधिकारी और अनधिकारी तथा गुप्त-मन्त्रणाकी विधि एवं स्थानका निर्देश  »  श्लोक 9-10h
 
 
श्लोक  12.83.9-10h 
अर्थमानार्घ्यसत्कारैर्भोगैरुच्चावचै: प्रियान्॥ ९॥
यानर्थभाजो मन्येथास्ते ते स्यु: सुखभागिन:।
 
 
अनुवाद
जिन्हें तुम अपना प्रिय समझते हो, उन्हें धन, सम्मान, भेंट, आतिथ्य और नाना प्रकार के सुखों से संतुष्ट करो, जिससे तुम्हारे प्रियजन तुम्हारे धन और सुख के भागी बन जाएँ ॥91/2॥
 
Satisfy those whom you consider dear to you with wealth, respect, offerings, hospitality and various kinds of pleasures, so that your loved ones become part of your wealth and happiness. ॥91/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)