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mahabharat 12.83.57: महल की ऊपरी मंजिल पर चढ़ना चाहिए अथवा किसी निर्जन एवं खुले मैदान में, जहाँ कुशा-कास-घास न उगती हो, बैठकर वाणी और शरीर के समस्त दोषों को त्यागकर, उचित समय आने पर गुप्त रूप से भावी कर्म का चिंतन करना चाहिए॥ 57॥   |   mahabharat अध्याय 12.83: सभासद् आदिके लक्षण, गुप्त सलाह सुननेके अधिकारी और अनधिकारी तथा गुप्त-मन्त्रणाकी विधि एवं स्थानका निर्देश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 83: सभासद् आदिके लक्षण, गुप्त सलाह सुननेके अधिकारी और अनधिकारी तथा गुप्त-मन्त्रणाकी विधि एवं स्थानका निर्देश  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  12.83.57 
आरुह्य वा वेश्म तथैव शून्यं
स्थलं प्रकाशं कुशकाशहीनम्।
वागङ्गदोषान् परिहृत्य सर्वान्
सम्मन्त्रयेत् कार्यमहीनकालम्॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
महल की ऊपरी मंजिल पर चढ़ना चाहिए अथवा किसी निर्जन एवं खुले मैदान में, जहाँ कुशा-कास-घास न उगती हो, बैठकर वाणी और शरीर के समस्त दोषों को त्यागकर, उचित समय आने पर गुप्त रूप से भावी कर्म का चिंतन करना चाहिए॥ 57॥
 
One should climb to the upper floor of the palace or sit in a desolate and open ground where there is no growth of kusha-kas-grass and then, abandoning all defects of speech and body, one should secretly contemplate about the future action at the appropriate time.॥ 57॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सभ्यादिलक्षणकथने त्र्यशीतितमोऽध्याय:॥ ८३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सभासद् आदिके लक्षणोंका कथनविषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८३॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)