| श्री महाभारत » पर्व 12: शान्ति पर्व » अध्याय 83: सभासद् आदिके लक्षण, गुप्त सलाह सुननेके अधिकारी और अनधिकारी तथा गुप्त-मन्त्रणाकी विधि एवं स्थानका निर्देश » श्लोक 37 |
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| | | | श्लोक 12.83.37  | अविद्वानशुचि: स्तब्ध: शत्रुसेवी विकत्थन:।
असुहृत् क्रोधनो लुब्धो न मन्त्रं श्रोतुमर्हति॥ ३७॥ | | | | | | अनुवाद | | जो मूर्ख, अशुद्ध, मंदबुद्धि, शत्रु का सेवक, डींग हांकने वाला, क्रोधी, लोभी और मित्रहीन है, उसे गुप्त मंत्रणा सुनने का अधिकार नहीं है। | | | | He who is foolish, impure, dull, a servant of the enemy, boasts, is wrathful, greedy and does not have a friend, does not have the right to listen to secret counsel. | | ✨ ai-generated | | |
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