श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 83: सभासद् आदिके लक्षण, गुप्त सलाह सुननेके अधिकारी और अनधिकारी तथा गुप्त-मन्त्रणाकी विधि एवं स्थानका निर्देश  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  12.83.12 
नैकमिच्छेद् गणं हित्वा स्याच्चेदन्यतरग्रह:।
यस्त्वेको बहुभि: श्रेयान् कामं तेन गणं त्यजेत्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
यदि एक ओर एक व्यक्ति हो और दूसरी ओर समूह हो, तो समूह को छोड़कर उस एक व्यक्ति को स्वीकार करने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। किन्तु यदि एक व्यक्ति अनेक व्यक्तियों से गुणों में श्रेष्ठ हो और उनमें से केवल एक को ही स्वीकार करना पड़े, तो ऐसी स्थिति में कल्याण चाहने वाले व्यक्ति को उस एक व्यक्ति के लिए समूह को त्याग देना चाहिए।॥12॥
 
If there is one person on one side and a group on the other, then one should not wish to leave the group and accept that one person. But if one person is superior in qualities to many people and one has to accept only one of them, then in such a situation, the person seeking welfare should abandon the group for that one person.॥12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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