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mahabharat 12.82.65-66: मैं आपके पिता का आदरणीय एवं सत्यनिष्ठ मित्र हूँ। हे मनुष्यों के स्वामी! आपके पिता की मृत्यु के पश्चात् जब आपका राज्य महान संकट में था, तब मैंने अपनी समस्त कामनाओं का त्याग करके (आपके कल्याण के लिए) तपस्या की थी। आपके प्रति स्नेह के कारण ही मैं पुनः यहाँ आया हूँ और आपसे ये सब बातें कह रहा हूँ, ताकि आप फिर किसी के चक्कर में न फँसें। 65-66   |   mahabharat अध्याय 12.82: मन्त्रियोंकी परीक्षाके विषयमें तथा राजा और राजकीय मनुष्योंसे सतर्क रहनेके विषयमें कालकवृक्षीय मुनिका उपाख्यान   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.82.65-66 
पितु: सखा च भवत: सम्मत: सत्यसङ्गर:।
व्यापन्ने भवतो राज्ये राजन् पितरि संस्थिते॥ ६५॥
सर्वकामान् परित्यज्य तपस्तप्तं तदा मया।
स्नेहात् त्वां तु ब्रवीम्येतन्मा भूयो विभ्रमेदिति॥ ६६॥
 
 
अनुवाद
मैं आपके पिता का आदरणीय एवं सत्यनिष्ठ मित्र हूँ। हे मनुष्यों के स्वामी! आपके पिता की मृत्यु के पश्चात् जब आपका राज्य महान संकट में था, तब मैंने अपनी समस्त कामनाओं का त्याग करके (आपके कल्याण के लिए) तपस्या की थी। आपके प्रति स्नेह के कारण ही मैं पुनः यहाँ आया हूँ और आपसे ये सब बातें कह रहा हूँ, ताकि आप फिर किसी के चक्कर में न फँसें। 65-66
 
I am your father's respected and truthful friend. O Lord of men! After your father's death, when your kingdom was in great trouble, I gave up all my desires and performed penance (for your welfare). Due to my affection for you, I have come here again and am telling you all these things so that you do not get entangled in anyone's affairs again. 65-66.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)