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mahabharat 12.82.57: यद्यपि मैंने इन लोगों के साथ विश्वासघात नहीं किया है, फिर भी ये मेरी ओर नकारात्मक दृष्टि से देखने लगे हैं। दुष्ट हृदय वाले शत्रु से सदैव उस सर्प के समान भयभीत रहना चाहिए, जिसकी पूँछ कुचल दी गई हो (इसलिए मैं अब यहाँ नहीं रहना चाहता)। ॥57॥   |   mahabharat अध्याय 12.82: मन्त्रियोंकी परीक्षाके विषयमें तथा राजा और राजकीय मनुष्योंसे सतर्क रहनेके विषयमें कालकवृक्षीय मुनिका उपाख्यान   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 82: मन्त्रियोंकी परीक्षाके विषयमें तथा राजा और राजकीय मनुष्योंसे सतर्क रहनेके विषयमें कालकवृक्षीय मुनिका उपाख्यान  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  12.82.57 
न हि तेषामहं द्रुग्धस्तत्तेषां दोषदर्शनम्।
अरेर्हि दुर्हृदाद् भेयं भग्नपुच्छादिवोरगात्॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि मैंने इन लोगों के साथ विश्वासघात नहीं किया है, फिर भी ये मेरी ओर नकारात्मक दृष्टि से देखने लगे हैं। दुष्ट हृदय वाले शत्रु से सदैव उस सर्प के समान भयभीत रहना चाहिए, जिसकी पूँछ कुचल दी गई हो (इसलिए मैं अब यहाँ नहीं रहना चाहता)। ॥57॥
 
Although I have not betrayed these people, they have started looking at me with a negative attitude. One should always be afraid of an enemy with a wicked heart, like a snake whose tail has been crushed (that is why I do not want to stay here anymore). ॥ 57॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)