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mahabharat 12.82.2-3: हे भरतवंशी युधिष्ठिर! यदि कोई मंत्री राजा के कोष से धन चुरा ले और राजा का कोई सेवक या कोई अन्य व्यक्ति राजा को राजकोष के नाश की सूचना दे, तो राजा को चाहिए कि वह एकान्त में उसकी बात सुने और मंत्री को अपने प्राण बचाने चाहिए; क्योंकि चोरी करने वाले मंत्री प्रायः उस व्यक्ति को मार डालते हैं जो उन्हें उजागर करता है॥ 2-3॥   |   mahabharat अध्याय 12.82: मन्त्रियोंकी परीक्षाके विषयमें तथा राजा और राजकीय मनुष्योंसे सतर्क रहनेके विषयमें कालकवृक्षीय मुनिका उपाख्यान   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 82: मन्त्रियोंकी परीक्षाके विषयमें तथा राजा और राजकीय मनुष्योंसे सतर्क रहनेके विषयमें कालकवृक्षीय मुनिका उपाख्यान  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  12.82.2-3 
ह्रियमाणममात्येन भृत्यो वा यदि वा भृत:।
यो राजकोशं नश्यन्तमाचक्षीत युधिष्ठिर॥ २॥
श्रोतव्यमस्य च रहो रक्ष्यश्चामात्यतो भवेत्।
अमात्या ह्यपहर्तारो भूयिष्ठं घ्नन्ति भारत॥ ३॥
 
 
अनुवाद
हे भरतवंशी युधिष्ठिर! यदि कोई मंत्री राजा के कोष से धन चुरा ले और राजा का कोई सेवक या कोई अन्य व्यक्ति राजा को राजकोष के नाश की सूचना दे, तो राजा को चाहिए कि वह एकान्त में उसकी बात सुने और मंत्री को अपने प्राण बचाने चाहिए; क्योंकि चोरी करने वाले मंत्री प्रायः उस व्यक्ति को मार डालते हैं जो उन्हें उजागर करता है॥ 2-3॥
 
Yudhishthira, O descendant of Bharata, if a minister steals wealth from the king's treasury and a servant or any other person brought up by the king informs the king about the destruction of the royal treasury, then the king should listen to him in private and the minister should save his life; because ministers who commit theft often kill the person who exposes them.॥ 2-3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)