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mahabharat 12.82.1: भीष्मजी कहते हैं - भरतनन्दन! राजा या राजनीतिज्ञ का यह पहला भाव है, अब दूसरा सुनो। राजा को सदैव उसी की रक्षा करनी चाहिए जो राजा का धन बढ़ाता हो ॥1॥   |   mahabharat अध्याय 12.82: मन्त्रियोंकी परीक्षाके विषयमें तथा राजा और राजकीय मनुष्योंसे सतर्क रहनेके विषयमें कालकवृक्षीय मुनिका उपाख्यान   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 82: मन्त्रियोंकी परीक्षाके विषयमें तथा राजा और राजकीय मनुष्योंसे सतर्क रहनेके विषयमें कालकवृक्षीय मुनिका उपाख्यान  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.82.1 
भीष्म उवाच
एषा प्रथमतो वृत्तिर्द्वितीयां शृणु भारत।
य: कश्चिज्जनयेदर्थं राज्ञा रक्ष्य: सदा नर:॥ १॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी कहते हैं - भरतनन्दन! राजा या राजनीतिज्ञ का यह पहला भाव है, अब दूसरा सुनो। राजा को सदैव उसी की रक्षा करनी चाहिए जो राजा का धन बढ़ाता हो ॥1॥
 
Bhishmaji says - Bharatanandan! This is the first attitude of a king or a politician, now listen to the second. The king should always protect the person who increases the wealth of the king. ॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)