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mahabharat 12.81.1: युधिष्ठिर ने पूछा, "पितामह! यदि आपसी वैमनस्य के कारण बंधु-बांधवों के समुदाय को वश में करना असम्भव हो जाए, कुटुम्बियों में दो दल हो जाएँ, तो एक दल का आदर करने से दूसरा दल अवश्य ही क्रोधित होगा। ऐसी स्थिति के कारण यदि मित्र भी शत्रु बन जाएँ, तो उन सबके मन को कैसे वश में किया जा सकता है?॥1॥   |   mahabharat अध्याय 12.81: कुटुम्बीजनोंमें दलबंदी होनेपर उस कुलके प्रधान पुरुषको क्या करना चाहिये? इसके विषयमें श्रीकृष्ण और नारदजीका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 81: कुटुम्बीजनोंमें दलबंदी होनेपर उस कुलके प्रधान पुरुषको क्या करना चाहिये? इसके विषयमें श्रीकृष्ण और नारदजीका संवाद  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.81.1 
युधिष्ठिर उवाच
एवमग्राह्यके तस्मिन् ज्ञातिसम्बन्धिमण्डले।
मित्रेष्वमित्रेष्वपि च कथं भावो विभाव्यते॥ १॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा, "पितामह! यदि आपसी वैमनस्य के कारण बंधु-बांधवों के समुदाय को वश में करना असम्भव हो जाए, कुटुम्बियों में दो दल हो जाएँ, तो एक दल का आदर करने से दूसरा दल अवश्य ही क्रोधित होगा। ऐसी स्थिति के कारण यदि मित्र भी शत्रु बन जाएँ, तो उन सबके मन को कैसे वश में किया जा सकता है?॥1॥
 
Yudhishthira asked, "Grandfather! If it becomes impossible to control the community of relatives and friends due to mutual rivalry, if there are two groups among the family members, then respecting one group will definitely anger the other group. If due to such a situation even friends become enemies, then how can the minds of all of them be controlled?॥1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)