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mahabharat 12.80.40: जो मनुष्य सदैव सावधान रहता है और इस प्रकार आचरण करता है, उसके शत्रु भी प्रसन्न होकर उसके साथ मित्रवत व्यवहार करने लगते हैं ॥40॥   |   mahabharat अध्याय 12.80: राजाके लिये मित्र और अमित्रकी पहचान तथा उन सबके साथ नीतिपूर्ण बर्तावका और मन्त्रीके लक्षणोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 80: राजाके लिये मित्र और अमित्रकी पहचान तथा उन सबके साथ नीतिपूर्ण बर्तावका और मन्त्रीके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  12.80.40 
अस्यैवं वर्तमानस्य पुरुषस्याप्रमादिन:।
अमित्रा: संप्रसीदन्ति तथा मित्रीभवन्त्यपि॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य सदैव सावधान रहता है और इस प्रकार आचरण करता है, उसके शत्रु भी प्रसन्न होकर उसके साथ मित्रवत व्यवहार करने लगते हैं ॥40॥
 
The man who always remains cautious and behaves like this, even his enemies become happy and start behaving like friends with him. ॥ 40॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)