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mahabharat 12.80.38: राजा का कर्तव्य है कि वह अपने वचनों और कर्मों से अपने जाति-बंधुओं का सदैव आदर करे। उसे सदैव वही करना चाहिए जो उन्हें प्रिय हो। उसे कभी कोई अप्रिय कार्य नहीं करना चाहिए। 38.   |   mahabharat अध्याय 12.80: राजाके लिये मित्र और अमित्रकी पहचान तथा उन सबके साथ नीतिपूर्ण बर्तावका और मन्त्रीके लक्षणोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 80: राजाके लिये मित्र और अमित्रकी पहचान तथा उन सबके साथ नीतिपूर्ण बर्तावका और मन्त्रीके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  12.80.38 
सम्मानयेत् पूजयेच्च वाचा नित्यं च कर्मणा।
कुर्याच्च प्रियमेतेभ्यो नाप्रियं किञ्चिदाचरेत्॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
राजा का कर्तव्य है कि वह अपने वचनों और कर्मों से अपने जाति-बंधुओं का सदैव आदर करे। उसे सदैव वही करना चाहिए जो उन्हें प्रिय हो। उसे कभी कोई अप्रिय कार्य नहीं करना चाहिए। 38.
 
It is the duty of the king to always respect his caste brethren through his words and actions. He should always do what is pleasing to them. He should never do any unpleasant act. 38.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)