Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.80.20: जो मित्र अपने मित्र पर आने वाली विपत्ति की आशंका से सदैव भयभीत रहता है और उसकी उन्नति देखकर ईर्ष्या नहीं करता, वह अपने ही आत्मा के समान कहा गया है ॥20॥ | mahabharat अध्याय 12.80: राजाके लिये मित्र और अमित्रकी पहचान तथा उन सबके साथ नीतिपूर्ण बर्तावका और मन्त्रीके लक्षणोंका वर्णन । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
व्यसनान्नित्यभीतो य: समृद्धॺा यो न दुष्यति।
यत् स्यादेवंविधं मित्रं तदात्मसममुच्यते॥ २०॥
अनुवाद
जो मित्र अपने मित्र पर आने वाली विपत्ति की आशंका से सदैव भयभीत रहता है और उसकी उन्नति देखकर ईर्ष्या नहीं करता, वह अपने ही आत्मा के समान कहा गया है ॥20॥
A friend who is always afraid of the possibility of a calamity befalling his friend and does not feel jealous on seeing his progress is said to be like one's own soul. ॥20॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥