श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 78: आपत्तिकालमें ब्राह्मणके लिये वैश्यवृत्तिसे निर्वाह करनेकी छूट तथा लुटेरोंसे अपनी और दूसरोंकी रक्षा करनेके लिये सभी जातियोंको शस्त्र धारण करनेका अधिकार एवं रक्षकको सम्मानका पात्र स्वीकार करना  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  12.78.6-7 
अजोऽग्निर्वरुणो मेष: सूर्योऽश्व:पृथिवी विराट्।
धेनुर्यज्ञश्च सोमश्च न विक्रेया: कथंचन॥ ६॥
पक्वेनामस्य निमयं न प्रशंसन्ति साधव:।
निमयेत् पक्वमामेन भोजनार्थाय भारत॥ ७॥
 
 
अनुवाद
बकरा अग्नि का स्वरूप है, भेड़ वरुण का स्वरूप है, घोड़ा सूर्य का स्वरूप है, पृथ्वी विराट का स्वरूप है और गौ यज्ञ और सोम का स्वरूप है; अतः इन्हें किसी भी प्रकार बेचना नहीं चाहिए। भरतनंदन! ब्राह्मण को बना-बनाया भोजन देकर उसके बदले में कच्चा भोजन लेना संतों को अच्छा नहीं लगता; किन्तु भोजन के बदले कच्चा भोजन देकर ही पका हुआ भोजन लिया जा सकता है।
 
Goat is the form of fire, sheep is the form of Varuna, horse is the form of sun, earth is the form of Virata and cow is the form of sacrifice and Som; therefore, these should never be sold in any way. Bharatanandan! Saints do not appreciate giving readymade food to a Brahmin and taking raw food in return; but only by giving raw food for food, cooked food can be taken in return.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)