श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 78: आपत्तिकालमें ब्राह्मणके लिये वैश्यवृत्तिसे निर्वाह करनेकी छूट तथा लुटेरोंसे अपनी और दूसरोंकी रक्षा करनेके लिये सभी जातियोंको शस्त्र धारण करनेका अधिकार एवं रक्षकको सम्मानका पात्र स्वीकार करना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  12.78.32 
भवत्यधर्मो धर्मो हि धर्माधर्मावुभावपि।
कारणाद् देशकालस्य देशकाल: स तादृश:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
देश और काल की परिस्थिति के कारण कभी अधर्म धर्म बन जाता है और कभी धर्म अधर्म में परिणत हो जाता है; क्योंकि वही देश और काल है ॥32॥
 
Due to the circumstances of time and place, sometimes adharma becomes dharma and sometimes dharma transforms into adharma; because that is the place and time. ॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)