श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 78: आपत्तिकालमें ब्राह्मणके लिये वैश्यवृत्तिसे निर्वाह करनेकी छूट तथा लुटेरोंसे अपनी और दूसरोंकी रक्षा करनेके लिये सभी जातियोंको शस्त्र धारण करनेका अधिकार एवं रक्षकको सम्मानका पात्र स्वीकार करना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  12.78.21 
क्षत्रियस्यातिवृत्तस्य ब्राह्मणेषु विशेषत:।
ब्रह्मैव संनियन्तृ स्यात् क्षत्रं हि ब्रह्मसम्भवम्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
जब कोई क्षत्रिय अपनी प्रजा पर, विशेषकर ब्राह्मणों पर अत्याचार करने लगता है, तो केवल ब्राह्मण ही उसका दमन कर सकता है, क्योंकि क्षत्रिय ब्राह्मण से ही उत्पन्न होता है ॥21॥
 
When a Kshatriya starts oppressing his subjects, especially the Brahmins, only a Brahmin can suppress him because the Kshatriya is born from a Brahmin. ॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)