श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 73: विद्वान् सदाचारी पुरोहितकी आवश्यकता तथा ब्राह्मण और क्षत्रियमें मेल रहनेसे लाभविषयक राजा पुरूरवाका उपाख्यान  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.73.5 
विमाननात् तयोरेव प्रजा नश्येयुरेव हि।
ब्रह्मक्षत्रं हि सर्वेषां वर्णानां मूलमुच्यते॥ ५॥
 
 
अनुवाद
उन दोनों का अनादर करने से प्रजा का नाश ही होता है, क्योंकि ब्राह्मण और क्षत्रिय ही सब जातियों के मूल कहे गए हैं ॥5॥
 
Disrespecting them both only results in the destruction of the people, because Brahmins and Kshatriyas are said to be the origin of all castes. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)