तस्माद् राजैव नान्योऽस्ति यो धर्मफलमाप्नुयात्।
स राज्यं धृतिमान् प्राप्य धर्मेण परिपालय।
इन्द्रं तर्पय सोमेन कामैश्च सुहृदो जनान्॥ ३३॥
अनुवाद
अतः ऐसे धर्म का फल धर्मात्मा राजा को ही मिलता है, अन्य किसी को नहीं। तुम निश्चय ही धैर्यवान हो। इस राज्य को पाकर धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करो। यज्ञ में सोमरस से इंद्र को संतुष्ट करो और अपने मित्रों को इच्छित वस्तुएँ प्रदान करके उन्हें संतुष्ट करो। 33॥
Therefore, only a righteous king gets the fruits of such religion and not anyone else. You are definitely patient. After getting this kingdom, follow the people religiously. In the Yagya, satisfy Indra with Somras and satisfy your friends by providing them with the desired things. 33॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि एकसप्ततितमोऽध्याय:॥ ७१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७१॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥