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श्लोक 12.70.14  |
वैशम्पायन उवाच
इदं वच: शान्तनवस्य शुश्रुवान्
युधिष्ठिर: पाण्डवमुख्यसंवृत:।
तदा ववन्दे च पितामहं नृपो
यथोक्तमेतच्च चकार बुद्धिमान्॥ १४॥ |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायनजी कहते हैं - 'हे जनमेजय! पितामह शान्तनु के पुत्र भीष्म की यह सलाह सुनकर बुद्धिमान राजा युधिष्ठिर ने पाण्डवों तथा प्रमुख राजाओं से घिरे हुए उन्हें प्रणाम किया और जैसा उन्होंने कहा था वैसा ही किया॥ 14॥ |
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| Vaishmpayana says, 'O Janamejaya! After listening to this advice of Bhishma, the son of the grandfather Shantanu, the wise king Yudhishthira, surrounded by the Pandavas and the chief kings, bowed to him and did as he had instructed.॥ 14॥ |
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सप्ततितमोऽध्याय:॥ ७०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७०॥
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