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श्लोक 12.68.40  |
न हि जात्ववमन्तव्यो मनुष्य इति भूमिप:।
महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति॥ ४०॥ |
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| अनुवाद |
| पृथ्वी की रक्षा करने वाले राजा की यह सोचकर कभी अवहेलना नहीं करनी चाहिए कि ‘वह भी मनुष्य है’, क्योंकि राजा मनुष्य रूप में महान देवता है ॥40॥ |
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| One should never disregard the king who protects the earth, thinking that 'he too is a human being', because the king is a great god in human form. ॥ 40॥ |
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