श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 68: वसुमना और बृहस्पतिके संवादमें राजाके न होनेसे प्रजाकी हानि और होनेसे लाभका वर्णन  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  12.68.40 
न हि जात्ववमन्तव्यो मनुष्य इति भूमिप:।
महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
पृथ्वी की रक्षा करने वाले राजा की यह सोचकर कभी अवहेलना नहीं करनी चाहिए कि ‘वह भी मनुष्य है’, क्योंकि राजा मनुष्य रूप में महान देवता है ॥40॥
 
One should never disregard the king who protects the earth, thinking that 'he too is a human being', because the king is a great god in human form. ॥ 40॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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