श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 65: इन्द्ररूपधारी विष्णु और मान्धाताका संवाद  »  श्लोक 5-6
 
 
श्लोक  12.65.5-6 
सामान्यार्थे व्यवहारे प्रवृत्ते
प्रियाप्रिये वर्जयन्नेव यत्नात् ।
चातुर्वर्ण्यस्थापनात् पालनाच्च
तैस्तैर्योगैर्नियमैरौरसैश्च ॥ ५॥
सर्वोद्योगैराश्रमं धर्ममाहु:
क्षात्रं श्रेष्ठं सर्वधर्मोपपन्नम्।
स्वं स्वं धर्मं येन चरन्ति वर्णा-
स्तांस्तान् धर्मानन्यथार्थान् वदन्ति॥ ६॥
 
 
अनुवाद
जब सामान्य लोगों के साथ व्यवहार आरम्भ हो, तब राजा को चाहिए कि वह रुचि-अरुचि का त्याग कर दे। भिन्न-भिन्न साधनों, नियमों, प्रयत्नों और समस्त प्रयत्नों द्वारा चारों वर्णों की स्थापना और रक्षा करने के कारण क्षात्र धर्म और गृहस्थ आश्रम श्रेष्ठ तथा समस्त धर्मों से परिपूर्ण कहे गए हैं; क्योंकि उस क्षात्र धर्म के सहारे ही सभी वर्णों के लोग अपने-अपने धर्मों का पालन करते हैं। कहा गया है कि क्षत्रिय धर्म के अभाव में उन समस्त धर्मों का उद्देश्य विपरीत हो जाता है॥5-6॥
 
When dealing with the common people begins, the king should try to abandon the feelings of likes and dislikes. Because of the establishment and protection of the four Varnas through different means, rules, efforts and all the efforts, the Kshatra Dharma and the Grihastha Ashram are said to be the best and full of all the Dharmas; because people of all Varnas follow their respective Dharmas only with the help of that Kshatra Dharma. It is said that in the absence of Kshatriya Dharma, the purpose of all those Dharmas becomes opposite.॥ 5-6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)