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mahabharat 12.63.5: नरेश्वर! उपर्युक्त दुर्गुणों से युक्त ब्राह्मण, चाहे वह वेदों का अध्ययन करता हो या नहीं, शूद्रों के समान है। उसे पंक्ति के बाहर दास की तरह भोजन कराना चाहिए। ये सभी राजसेवक आदि नीच ब्राह्मणों और शूद्रों के समान हैं। राजन! इन्हें ईश्वर के कार्य में त्याग देना चाहिए। 5॥   |   mahabharat अध्याय 12.63: वर्णाश्रमधर्मका वर्णन तथा राजधर्मकी श्रेष्ठता   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 63: वर्णाश्रमधर्मका वर्णन तथा राजधर्मकी श्रेष्ठता  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.63.5 
जपन् वेदानजपंश्चापि राजन्
सम: शूद्रैर्दासवच्चापि भोज्य:।
एते सर्वे शूद्रसमा भवन्ति
राजन्नेतान् वर्जयेद् देवकृत्ये॥ ५॥
 
 
अनुवाद
नरेश्वर! उपर्युक्त दुर्गुणों से युक्त ब्राह्मण, चाहे वह वेदों का अध्ययन करता हो या नहीं, शूद्रों के समान है। उसे पंक्ति के बाहर दास की तरह भोजन कराना चाहिए। ये सभी राजसेवक आदि नीच ब्राह्मणों और शूद्रों के समान हैं। राजन! इन्हें ईश्वर के कार्य में त्याग देना चाहिए। 5॥
 
Nareshwar! A Brahmin with the above mentioned vices, whether he studies the Vedas or not, is equal to the Shudras. He should be fed outside the queue like a slave. All these royal servants etc. are equal to the lowly Brahmins and Shudras. Rajan! These should be abandoned in the work of God. 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)