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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 63: वर्णाश्रमधर्मका वर्णन तथा राजधर्मकी श्रेष्ठता  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  12.63.30 
यथा जीवा: प्राकृतैर्वध्यमाना
धर्मश्रुतानामुपपीडनाय।
एवं धर्मा राजधर्मैर्वियुक्ता:
संचिन्वन्तो नाद्रियन्ते स्वधर्मम्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
जैसे पशु, पक्षी आदि शिकारी आदि नीच मनुष्यों द्वारा मारे जाने पर मारने वाले का धर्म नष्ट हो जाता है, वैसे ही यदि धर्मात्मा पुरुष राजधर्म से रहित हों, तो धर्म का अनुसंधान करने पर भी वे चोर-लुटेरों के उत्पात के कारण अपने धर्म की मर्यादा नहीं रख पाते और संसार की हानि का कारण बनते हैं (इसलिए राजधर्म ही श्रेष्ठ है)॥30॥
 
Just as animals, birds etc., when killed by hunters and other lowly men, destroy the religion of the killer, similarly, if righteous men are devoid of Rajdharma, then even after researching about dharma, they are unable to maintain respect for their own dharma due to the mischief of thieves and robbers and thus become the cause of harm to the world (therefore, Rajdharma is the best).॥ 30॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि वर्णाश्रमधर्मकथने त्रिषष्टितमोऽध्याय:॥ ६३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें वर्णाश्रमधर्मका वर्णनविषयक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६३॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)