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mahabharat 12.63.26: धर्म के ज्ञाता आर्य पुरुष कहते हैं कि अन्य सब धर्मों का आश्रय अल्प है और उनका फल भी अल्प है। परन्तु क्षात्र धर्म का आश्रय भी महान है और उसका फल भी बहुत है तथा परम कल्याणकारी है, अतः उसके समान दूसरा कोई धर्म नहीं है॥ 26॥   |   mahabharat अध्याय 12.63: वर्णाश्रमधर्मका वर्णन तथा राजधर्मकी श्रेष्ठता   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 63: वर्णाश्रमधर्मका वर्णन तथा राजधर्मकी श्रेष्ठता  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  12.63.26 
अल्पाश्रयानल्पफलान् वदन्ति
धर्मानन्यान् धर्मविदो मनुष्या:।
महाश्रयं बहुकल्याणरूपं
क्षात्रं धर्मं नेतरं प्राहुरार्या:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
धर्म के ज्ञाता आर्य पुरुष कहते हैं कि अन्य सब धर्मों का आश्रय अल्प है और उनका फल भी अल्प है। परन्तु क्षात्र धर्म का आश्रय भी महान है और उसका फल भी बहुत है तथा परम कल्याणकारी है, अतः उसके समान दूसरा कोई धर्म नहीं है॥ 26॥
 
The Aryan men who are the knowers of religion say that all other religions have little support and their fruits are also small. But the support of Kshatra Dharma is also great and its fruits are also numerous and of the form of supreme welfare, hence there is no other religion like this.॥ 26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)