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mahabharat 12.62.8: जो मनुष्य जिस भी अवस्था में, जिस भी स्थान या काल में, तथा जिस भी उद्देश्य से कोई विशेष कर्म करता है, वह (उसी अवस्था में, उसी स्थान या काल में) उसी भावना से उस कर्म का वैसा ही फल प्राप्त करता है। ॥8॥   |   mahabharat अध्याय 12.62: ब्राह्मणधर्म और कर्तव्यपालनका महत्त्व   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 62: ब्राह्मणधर्म और कर्तव्यपालनका महत्त्व  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  12.62.8 
यो यस्मिन् कुरुते कर्म यादृशं येन यत्र च।
तादृशं तादृशेनैव स गुणं प्रतिपद्यते॥ ८॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य जिस भी अवस्था में, जिस भी स्थान या काल में, तथा जिस भी उद्देश्य से कोई विशेष कर्म करता है, वह (उसी अवस्था में, उसी स्थान या काल में) उसी भावना से उस कर्म का वैसा ही फल प्राप्त करता है। ॥8॥
 
Whatever a person does a particular act in whatever condition, in whatever place or time, and with whatever purpose, he (in the same condition, in the same place or time) with the same feeling receives the same result of that act. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)