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mahabharat 12.62.5: पाण्डुनन्दन! जो निन्दनीय शब्द दास, कुत्ते, भेड़िये आदि संसार के अन्य पशुओं के लिए कहे जाते हैं, वही निन्दनीय शब्द वर्णधर्म के विरुद्ध कर्म करने वाले ब्राह्मण के लिए भी कहे जाते हैं।   |   mahabharat अध्याय 12.62: ब्राह्मणधर्म और कर्तव्यपालनका महत्त्व   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 62: ब्राह्मणधर्म और कर्तव्यपालनका महत्त्व  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.62.5 
या संज्ञा विहिता लोके दासे शुनि वृके पशौ।
विकर्मणि स्थिते विप्रे सैव संज्ञा च पाण्डव॥ ५॥
 
 
अनुवाद
पाण्डुनन्दन! जो निन्दनीय शब्द दास, कुत्ते, भेड़िये आदि संसार के अन्य पशुओं के लिए कहे जाते हैं, वही निन्दनीय शब्द वर्णधर्म के विरुद्ध कर्म करने वाले ब्राह्मण के लिए भी कहे जाते हैं।
 
Pandunandan! The same condemnatory terms that are given to slaves, dogs, wolves and other animals in the world are also given to a Brahmin engaged in activities contrary to his varnadharma. 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)