श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 59: ब्रह्माजीके नीतिशास्त्रका तथा राजा पृथुके चरित्रका वर्णन  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  12.59.9 
कथमेको महीं कृत्स्नां शूरवीरार्यसंकुलाम्।
रक्षत्यपि च लोकस्य प्रसादमभिवाञ्छति॥ ९॥
 
 
अनुवाद
वह अकेला होकर भी किस प्रकार वीर और गुणवान लोगों से भरी हुई इस सम्पूर्ण पृथ्वी का पालन करता है और किस प्रकार सम्पूर्ण जगत् के लिए सुख की कामना करता है? ॥9॥
 
How does he, even though he is alone, take care of this entire earth filled with valiant and virtuous people and how does he seek happiness for the entire world? ॥9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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