| श्री महाभारत » पर्व 12: शान्ति पर्व » अध्याय 59: ब्रह्माजीके नीतिशास्त्रका तथा राजा पृथुके चरित्रका वर्णन » श्लोक 56-58 |
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| | | | श्लोक 12.59.56-58  | दुश्चेष्टितं च विविधं वृत्तिश्चैवानुवर्तिनाम्।
शङ्कितत्वं च सर्वस्य प्रमादस्य च वर्जनम्॥ ५६॥
अलब्धलाभो लब्धस्य तथैव च विवर्धनम्।
प्रदानं च विवृद्धस्य पात्रेभ्यो विधिवत्तत:॥ ५७॥
विसर्गोऽर्थस्य धर्मार्थं कामहैतुकमुच्यते।
चतुर्थं व्यसनाघाते तथैवात्रानुवर्णितम्॥ ५८॥ | | | | | | अनुवाद | | नाना प्रकार के कुविचार, अपने सेवकों की जीविका के विषय में सोचना, सब पर संदेह करना, प्रमाद का त्याग करना, अप्राप्य को प्राप्त करना, प्राप्त वस्तुओं को सुरक्षित रखते हुए उनकी वृद्धि करना तथा बढ़ी हुई वस्तुओं को योग्य व्यक्तियों को उचित रीति से दान करना - यह धन का प्रथम उपयोग है। धर्म के लिए धन का त्याग उसका दूसरा उपयोग है, विषय-भोगों में उसका व्यय करना तीसरा उपयोग है तथा समस्याओं के समाधान में उसका व्यय करना उसका चौथा उपयोग है। इन सब बातों का उस ग्रन्थ में भली-भाँति वर्णन किया गया है। 56-58। | | | | Various kinds of evil intentions, thinking about the livelihood of one's servants, being suspicious of everyone, abandoning negligence, acquiring the unobtainable, increasing the acquired goods while preserving them and donating the increased goods to the deserving in a proper manner - this is the first use of wealth. Renunciation of wealth for the sake of Dharma is its second use, spending it for sensual pleasures is the third and spending it for solving problems is its fourth use. All these things have been well described in that book. 56-58. | | ✨ ai-generated | | |
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