श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 59: ब्रह्माजीके नीतिशास्त्रका तथा राजा पृथुके चरित्रका वर्णन  »  श्लोक 51-52
 
 
श्लोक  12.59.51-52 
सप्ताङ्गस्य च राज्यस्य ह्रासवृद्धिसमञ्जसम्।
दूतसामर्थ्यसंयोगात् सराष्ट्रस्य विवर्धनम्॥ ५१॥
अरिमध्यस्थमित्राणां सम्यक् चोक्तं प्रपञ्चनम्।
अवमर्द: प्रतीघातस्तथैव च बलीयसाम्॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
सात अंगों वाले राज्य का पतन, विकास और स्थिति, दूत के बल से अपनी और अपने राष्ट्र की वृद्धि, शत्रु, मित्र और मध्यस्थों का विस्तारपूर्वक उचित विश्लेषण, बलवान शत्रुओं को कुचलने और उनका सामना करने की विधि आदि का वर्णन उक्त ग्रन्थ में किया गया है ॥51-52॥
 
The decline, growth and condition of the state consisting of seven parts, the growth of oneself and one's nation due to the power of the messenger, proper analysis of enemies, friends and mediators in detail, the method of crushing the powerful enemies and confronting them, etc. have been described in the said book. 51-52॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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