श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 59: ब्रह्माजीके नीतिशास्त्रका तथा राजा पृथुके चरित्रका वर्णन  »  श्लोक 45-46
 
 
श्लोक  12.59.45-46 
कल्पना विविधाश्चापि नृनागरथवाजिनाम्।
व्यूहाश्च विविधाभिख्या विचित्रं युद्धकौशलम्॥ ४५॥
उत्पाताश्च निपाताश्च सुयुद्धं सुपलायितम्।
शस्त्राणां पालनं ज्ञानं तथैव भरतर्षभ॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
सेना को बल देने के लिए नाना प्रकार के योग, हाथी, घोड़े, रथ और मानव सेना की नाना प्रकार की व्यूहरचनाएँ, उछलकर ऊपर उठना, झुककर अपनी रक्षा करना, सावधानी से युद्ध करना और वहाँ से कुशलतापूर्वक निकल भागना आदि विविध प्रकार के युद्ध कौशल - ये सब विधियाँ भी इस ग्रन्थ में वर्णित हैं। हे भरतश्रेष्ठ! इसमें शस्त्रों की रक्षा और प्रयोग का ज्ञान भी बताया गया है। ॥45-46॥
 
Various types of yogas to strengthen the army, different formations of elephants, horses, chariots and human forces, various types of war skills like jumping up, saving oneself by bending down, fighting cautiously and escaping from there skillfully - all these methods are also described in this book. O best of the Bharatas! The knowledge of protection and use of weapons is also mentioned in it. ॥ 45-46॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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