श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 59: ब्रह्माजीके नीतिशास्त्रका तथा राजा पृथुके चरित्रका वर्णन  »  श्लोक 38-39
 
 
श्लोक  12.59.38-39 
यात्राकालाश्च चत्वारस्त्रिवर्गस्य च विस्तर:।
विजयो धर्मयुक्तश्च तथार्थविजयश्च ह॥ ३८॥
आसुरश्चैव विजयस्तथा कात्‍स्‍न्‍‍‍र्येन वर्णित:।
लक्षणं पञ्चवर्गस्य त्रिविधं चात्र वर्णितम्॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
शत्रुओं पर आक्रमण करने के चार अवसर, धर्म-विजय, अर्थ-विजय और असुर-विजय इन तीन वर्णों का विस्तार भी उपर्युक्त ग्रन्थ में पूर्णतः वर्णित किया गया है। मंत्री, राष्ट्र, दुर्ग, सेना और कोष - इन पाँच वर्णों के तीन प्रकार के लक्षण भी उत्तम, मध्यम और निकृष्ट भेद के आधार पर प्रतिपादित किए गए हैं।॥38-39॥
 
The four* occasions of attacking the enemies, the expansion of the three classes, Dharma-Vijaya, Artha-Vijaya and Asura-Vijaya have also been fully described in the above book. The three types of characteristics of the five classes - minister, nation, fort, army and treasury - have also been propounded on the basis of the best, middle and worst distinction.॥ 38-39॥
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