श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 59: ब्रह्माजीके नीतिशास्त्रका तथा राजा पृथुके चरित्रका वर्णन  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  12.59.36 
मन्त्रश्च वर्णित: कृत्स्नस्तथा भेदार्थ एव च।
विभ्रमश्चैव मन्त्रस्य सिद्‍ध्यसिद्धॺोश्च यत् फलम्॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
इस शास्त्र में सभी प्रकार के परामर्श, विवेक के प्रयोग का उद्देश्य, परामर्श में होने वाला भ्रम अथवा उसके भंग होने का भय तथा परामर्श की सफलता और असफलता के परिणाम भी वर्णित हैं ॥36॥
 
All types of counselling, the purpose of using discrimination, the confusion that occurs in counselling, or the fear of it breaking and the results of success and failure of counselling, are also described in this scripture. 36॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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