श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 59: ब्रह्माजीके नीतिशास्त्रका तथा राजा पृथुके चरित्रका वर्णन  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  12.59.31 
मोक्षस्यास्ति त्रिवर्गोऽन्य: प्रोक्त: सत्त्वं रजस्तम:।
स्थानं वृद्धि: क्षयश्चैव त्रिवर्गश्चैव दण्डज:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
मोक्षक त्रिवर्ग दूसरा कहा गया है। इसमें सत्व, रज और तामसी गुणों की गणना की जाती है। दण्डजन्य त्रिवर्ग उससे भिन्न है। स्थान, वृद्धि और क्षय - ये इसके रहस्य हैं (अर्थात् दण्ड से धनवानों की स्थिति, धर्मात्माओं की वृद्धि और दुष्टों का विनाश होता है)। 31॥
 
Mokshaka trivarga is said to be the second one. Sattva, Raja and Tamaki are calculated in it. The punishment generated trivarga is different from that. Location, growth and decay - these are its secrets (that is, punishment leads to the condition of the rich, growth of the righteous and destruction of the wicked). 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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