श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 59: ब्रह्माजीके नीतिशास्त्रका तथा राजा पृथुके चरित्रका वर्णन  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  12.59.27 
अत्र नि:श्रेयसं यन्नस्तद् ध्यायस्व पितामह।
त्वत्प्रभावसमुत्थोऽसौ स्वभावो नो विनश्यति॥ २७॥
 
 
अनुवाद
‘पितामह! अब आप कोई ऐसा उपाय सोचिए जिससे हमारा कल्याण हो सके। आपके प्रभाव से हमें जो दिव्य स्वभाव प्राप्त हुआ था, वह नष्ट हो रहा है।’॥27॥
 
‘Grandfather! Now think of a way by which we can be benefited. The divine nature which we had received due to your influence is getting destroyed.'॥ 27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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