श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 59: ब्रह्माजीके नीतिशास्त्रका तथा राजा पृथुके चरित्रका वर्णन  »  श्लोक 115-116h
 
 
श्लोक  12.59.115-116h 
मन्वन्तरेषु सर्वेषु विषमा जायते मही।
उज्जहार ततो वैन्य: शिलाजालान् समन्तत:॥ ११५॥
धनुष्कोटॺा महाराज तेन शैला विवर्धिता:।
 
 
अनुवाद
महाराज! सभी मन्वन्तरों में पृथ्वी ऊँची-नीची होती रहती है; उस समय वेनकुमार पृथु ने धनुष से सब ओर की चट्टानों को उखाड़कर एक स्थान पर एकत्र कर लिया; इसी कारण पर्वतों की लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई बढ़ गई ॥115 1/2॥
 
Maharaj! In all the Manvantaras the earth becomes high and low; at that time Venkumar Prithu uprooted the rocks from all sides with the bow and collected them at one place; that is why the length, breadth and height of the mountains increased. ॥ 115 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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