श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 59: ब्रह्माजीके नीतिशास्त्रका तथा राजा पृथुके चरित्रका वर्णन  »  श्लोक 110
 
 
श्लोक  12.59.110 
एवमस्त्विति वैन्यस्तु तैरुक्तो ब्रह्मवादिभि:।
पुरोधाश्चाभवत् तस्य शुक्रो ब्रह्ममयो निधि:॥ ११०॥
 
 
अनुवाद
उसके ऐसा कहने पर वेदवेत्ता महर्षियों ने उससे कहा - 'ऐसा ही हो।' तब वेदविद्या के भंडार शुक्राचार्य उनके पुरोहित हुए॥110॥
 
On his saying this, the great sages of the Vedas replied to him, 'So be it'. Then Shukracharya, who is the repository of Vedic knowledge, became their priest.॥ 110॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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