श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 59: ब्रह्माजीके नीतिशास्त्रका तथा राजा पृथुके चरित्रका वर्णन  »  श्लोक 101
 
 
श्लोक  12.59.101 
सुसूक्ष्मा मे समुत्पन्ना बुद्धिर्धर्मार्थदर्शिनी।
अनया किं मया कार्यं तन्मे तत्त्वेन शंसत॥ १०१॥
 
 
अनुवाद
महात्माओं! मुझे धर्म और अर्थ का बोध कराने वाली अत्यंत सूक्ष्म बुद्धि स्वतः ही प्राप्त हो गई है। कृपया मुझे यह बताइए कि इस बुद्धि से मुझे आपकी क्या सेवा करनी है॥101॥
 
‘Mahatmas! I have automatically acquired a very subtle intellect which shows the meaning of religion and wealth. Please tell me exactly what service I have to render to you with this intellect.॥101॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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