श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 57: राजाके धर्मानुकूल नीतिपूर्ण बर्तावका वर्णन  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.57.7 
गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानत:।
उत्पथप्रतिपन्नस्य दण्डो भवति शाश्वत:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
यदि अभिमान से युक्त, कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान हीन तथा कुमार्ग पर चलने वाला मनुष्य ही उसका गुरु है, तो उसे भी दण्ड देने का सनातन विधान है।' 7॥
 
'If a person filled with pride and without knowledge of duty and non-duty and who follows the wrong path is his teacher, then there is an eternal law to punish him also.' 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)