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mahabharat 12.57.42: राज्य करने की इच्छा रखने वाले राजाओं के लिए अपनी प्रजा की भलीभाँति रक्षा करने के अतिरिक्त और कोई सनातन धर्म नहीं है; रक्षा से ही संसार का पालन होता है ॥ 42॥   |   mahabharat अध्याय 12.57: राजाके धर्मानुकूल नीतिपूर्ण बर्तावका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 57: राजाके धर्मानुकूल नीतिपूर्ण बर्तावका वर्णन  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  12.57.42 
तद्राज्ये राज्यकामानां नान्यो धर्म: सनातन:।
ऋते रक्षां तु विस्पष्टां रक्षा लोकस्य धारिणी॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
राज्य करने की इच्छा रखने वाले राजाओं के लिए अपनी प्रजा की भलीभाँति रक्षा करने के अतिरिक्त और कोई सनातन धर्म नहीं है; रक्षा से ही संसार का पालन होता है ॥ 42॥
 
For kings who desire to rule, there is no other eternal Dharma except to protect their subjects well; protection alone will sustain the world. ॥ 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)