श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  12.56.8 
तदग्रे राजधर्मान् हि मदर्थे त्वं पितामह।
प्रब्रूहि भरतश्रेष्ठ त्वं हि धर्मभृतां वर:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
इसलिए हे भरत के पितामह! सबसे पहले आप मुझसे राजा के कर्तव्यों का वर्णन कीजिए, क्योंकि आप पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ हैं।॥8॥
 
Therefore, O great grandfather of Bharata, first of all you should describe to me the duties of a king, because you are the best among the virtuous. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)