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श्लोक 12.56.61  |
एते चैवापरे चैव दोषा: प्रादुर्भवन्त्युत।
नृपतौ मार्दवोपेते हर्षुले च युधिष्ठिर॥ ६१॥ |
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| अनुवाद |
| युधिष्ठिर! जब राजा विनोदी और सौम्य स्वभाव का हो जाता है, तब उपर्युक्त तथा अन्य दोष भी प्रकट हो जाते हैं ॥ 61॥ |
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| Yudhishthira! When the king becomes humorous and gentle-natured, then the above-mentioned and other faults also become manifest. ॥ 61॥ |
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि षट्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५६॥
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