श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  12.56.57 
विस्रंसयन्ति मन्त्रं च विवृण्वन्ति च दुष्कृतम्।
लीलया चैव कुर्वन्ति सावज्ञास्तस्य शासनम्॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
वे राज-भेद और राजा के दोष दूसरों को बताते हैं। वे राजा की आज्ञाओं का उल्लंघन करते हैं और उनका पालन करते हुए उनके साथ खिलवाड़ करते हैं। 57.
 
They reveal the royal secrets and the faults of the king to others. They disobey the king's orders and play with them while following them. 57.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)