श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  12.56.49 
अवमन्यन्ति भर्तारं संघर्षादुपजीविन:।
स्वे स्थाने न च तिष्ठन्ति लंघयन्ति च तद्वच:॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
राजा के द्वारा जीविका कमाने वाले सेवक बहुत बातूनी हो जाते हैं और अपने स्वामी का अपमान करते हैं। वे अपनी मर्यादा में स्थिर नहीं रहते और स्वामी की आज्ञा का उल्लंघन करने लगते हैं॥ 49॥
 
Servants who earn their livelihood from the king become too talkative and insult their master. They do not remain steadfast in their limits and start violating their master's orders.॥ 49॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)