न संत्याज्यं च ते धैर्यं कदाचिदपि पाण्डव।
धीरस्य स्पष्टदण्डस्य न भयं विद्यते क्वचित्॥ ४७॥
अनुवाद
हे पाण्डुपुत्र! तुम्हें कभी धैर्य नहीं खोना चाहिए। जो राजा अपराधियों को दण्ड देने में संकोच नहीं करता तथा सदैव धैर्यवान रहता है, वह कभी भयभीत नहीं होता ॥47॥
O son of Pandu! You should never lose patience. A king who does not hesitate in punishing criminals and is always patient, is never afraid. ॥ 47॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥