श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  12.56.43 
लोकस्य व्यसनी नित्यं परिभूतो भवत्युत।
उद्वेजयति लोकं च योऽतिद्वेषी महीपति:॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
जो राजा दुर्गुणों में आसक्त रहता है, उसका सभी लोग सदैव अनादर करते हैं और जो राजा सबके प्रति अत्यंत द्वेष रखता है, वह सबको अशांत कर देता है ॥ 43॥
 
A king who is addicted to vices is always disrespected by all and a king who bears extreme hatred towards everyone, makes everyone restless. ॥ 43॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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