श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  12.56.41 
प्रत्यक्षेणानुमानेन तथौपम्यागमैरपि।
परीक्ष्यास्ते महाराज स्वे परे चैव नित्यश:॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
महाराज! प्रत्यक्ष, अनुमान, सादृश्य और शास्त्र - इन चार प्रमाणों के द्वारा अपने और पराये की पहचान करने का सदैव प्रयत्न करना चाहिए ॥ 41॥
 
Maharaj! One should always try to identify one's own and others with the help of these four proofs - direct perception, inference, analogy and the scriptures. ॥ 41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)