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mahabharat 12.56.39: नीच मनुष्य क्षमाशील राजा का सदैव तिरस्कार करते हैं, जैसे हाथी का महावत उसके सिर पर बैठना चाहता है ॥39॥   |   mahabharat अध्याय 12.56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  12.56.39 
क्षममाणं नृपं नित्यं नीच: परिभवेज्जन:।
हस्तियन्ता गजस्यैव शिर एवारुरुक्षति॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
नीच मनुष्य क्षमाशील राजा का सदैव तिरस्कार करते हैं, जैसे हाथी का महावत उसके सिर पर बैठना चाहता है ॥39॥
 
'Mean men always despise a forgiving king, just as the mahout of an elephant wants to sit on his head.'॥ 39॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)